हत्या और आत्महत्या दोनों ठीक नहीं है।किसी की जान लेने का हमें कोई अधिकार नहीं है।इसी तरह जीवन में कितनी ही बाधाएं आती है और आएंगी।हमें निराश नहीं होना चाहिए।हमेशा अच्छे के लिए प्रयत्न करते रहे।हम सभी जानते हैं जीवन का एक न एक दिन अंत होगा।तो उसके लिए हम आत्महत्या क्यूं करें।जो आनी तय है उसके लिए हम प्रयास क्यूं करें।हम प्रयास करें तो कुछ अच्छा करें।अपनी उलझनों को सुलझाने का प्रयास करें।कार्य करें।इस शरीर में असीम क्षमता है पर अपनी क्षमतानुसार करते चलें।पर आत्महत्या या हत्या न करें। दुनिया में सात जन्म कम लगें इतना काम है।रोजगार देखने की दृष्टि उत्पन्न कीजिए।
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महाकाल
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महाकाल जाओ तो केवड़े का फूल,माला और प्रसाद एक ही लेना।कोई दो इसलिए भी ले सकता है खुल्ले रूपए न हो।व जिससे प्रसाद लिया उसके पास मुझे फूल- माला नहीं दिखी।प्रसाद दो भी ले सकते ,हो सकता हो किसी ओर के लिए भी चढ़ा रहे हो।मन में श्रद्धा होनी चाहिए यूं तो नहीं कहेंगे कर्मकांड है।श्रंगार में जो चढ़ता वह जरूरी भी होता है।एक ही दुकान पर पूरा जो श्रृंगार चढ़ता हो तो अच्छा है।टोकरी गलती से आ रही थी क्योंकि खुल्ले पैसे के कारण वह भी बोलना भूल गया कि टोकरी दे जाना।मैं रास्ते भर सोचती रही पंडितजी ने टोकरी क्युं नहीं ली।इसका क्या करूं।लगेज की दिक्कत रहती है।खाने की होटल पर सोचा भी इसको वहीं छोड़ दूं।वो तो रेलवे स्टेशन के वहां दो चार व्यक्ति आ रहे थे उनमें से एक बोला महाकाल की टोकरी है ना।मैं दे दुंगा।तो उसको दे दी।